मटर की खेती कैसे करें,मटर की उन्नत किसमे,मटर की खेती में कौन सी खाद डालें

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मटर की खेती कैसे करें,मटर की उन्नत किसमे,मटर की खेती में कौन सी खाद डालें

मटर की खेती कैसे करें,मटर की खेती करने का तरीका और मटर की उन्नत किसमे:-नमस्कार दोस्तों आप साभिका हमारे लेख मे स्वागत है हम आपके लिए हररोज नई जानकारी लेके आते रहते है जिसके किसान के लिए योजना और खेती के बारेमे सही जानकारी लेके आते रहते है आज के इस लेक के अंदर हम आपको मटर की खेती के बारे मे बताएंगे मटर की खेती कैसे करे कब करे कॉनसी किस्म का उपयोग करे और मटर की खेती करने का सही समय के बारे मेभी जानकारी देंगे तो किसान भाई को इस लेख के अंदर जानकारी देंगे की किसान मटर की खेती करके बढ़िया कमाई कर सके तो कृपया इस लेख को पूरा पढे 

मटर की खेती के लिए जमीन

मटर की खेती आम तौर पर सभी प्रकार की जमीन के अंदर होता है लेकिन आपको अगर मटर की खेती कर के सही से उत्पादन लेना आई तो आपकी जमीन मे दोमट मिट्टी मिट्टी वाली होनी चाइए और उसका मान ph 5 से 7 बढ़िया होता है. के अंदर पानी नियंत्रण की व्यवस्था होनी चाइए और उसके साथ आपकी जमीन के अंदर सभी प्रकार के पोषक तत्व होने चाइए जिसकी मदद से मटर की खेती के अंदर ज्यादा उत्पादन मिलपाए 

मटर की खेती के लिए खेत तैयार

मटर की खेती के लिए खेत तैयार करने के लिए आपको सबसे पहले आपको अपने खेत के अंदर कल्टीवेटर लगाके आपको अपनी खेत की दो से तीन बार जुताई कर लेनी चाइए उसके बाद एकड़ के इसाब से सड़ी हुई गोबर की काद अपने खेत मे डाल के फिर से जुताई कर लेनी चाइए उसके बाद आपके केत को पाटा लगाकर समतल बनालेना चाइए और उसके बाद आपको कयारे बना लेना चाइए  

मटर की खेती की उन्नत किसमे 

आर्किल 

इस विस्तारपूर्ण प्रजाति को फ्रांस से आई विदेशी प्रजाति कहा जाता है, जो व्यापक रूप से उगाई जाती है। इसका दाना निकालने का प्रतिशत अधिकतम है और यह ताजा बाजार में बेचने और निर्जलीकरण के लिए उपयुक्त है। पहली चुनौती बोआई के बाद यह 60-65 दिन में पूरा होता है। हरी फली की उपज 8-10 टन प्रति हेक्टेयर है।

जवाहर मटर 3 (जे एम 3)

यह प्रजाति जबलपुर में टी 19 और अर्ली बैजर के संकरण के बाद वरणों द्वारा विकसित की गई है। इस प्रजाति में दाना प्राप्ति का अंश अधिक (45 प्रतिशत) होता है। बोनाई के 50-50 दिनों के बाद पहली तुड़ाई प्रारंभ होती है। औसत उत्पादन 4 टन प्रति हेक्टेयर है।

जवाहर मटर 4 (जे एम 4)

यह प्रजाति जबलपुर में संकर टी 19 और लिटिल मार्वल से उन्नत पीढ़ियों द्वारा विकसित हुई है। इसकी पहली तुड़ाई 70 दिनों के बाद शुरू की जा सकती है। इसके दानों का 40 प्रतिशत निकाल युक्त औसत फल उत्पादन 7 टन प्रति हेक्टेयर होता है।

बी.एल

अगेती मटर – 7 (वी एल – 7) नेमक विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा में विकसित हुई प्रजाति है। इसके छिलके को हटाने पर 42 प्रतिशत दाना के साथ 10 टन प्रति हेक्टेयर की औसत उपज प्राप्त होती है।

हरभजन 

यह प्रजाति जबलपुर में विदेशी आनुवंशिक सामग्री से विकसित हुई है। इसे एक अधिक अगेती प्रजाति माना जाता है, और इसकी पहली चुनौती बोआई के 45 दिनों के बाद की जा सकती है। इससे औसत फली उत्पादन 3 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है।

जवाहार पी.4

यह प्रजाति जबलपुर में छोटी पहाड़ियों के लिए विकसित हुई चूर्णिल फफूंदी प्रतिरोधी और मिलावट सहिष्णु प्रजाति है। इसकी पहली चुनौती छोटी पहाड़ियों में 60 दिनों के बाद और मैदानों में 70 दिनों के बाद शुरू होती है। छोटी पहाड़ियों में औसत फली उत्पादन 3-4 टन प्रति हेक्टेयर और मैदानों में 9 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है।

मटर की बीज बुआई की बीज मात्रा और बुआई का तरीका 

अगेती बुआई के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज की आवश्यकता है। इसे बुआई से पहले रोगों से बचाने के लिए उपचारित कर लेना चाहिए। इसके लिए थीरम 2 ग्राम या मैकोंजेब 3 ग्राम को प्रति किलो बीज शोधन करना चाहिए। इसकी बुआई किस्म के लिए 24 घंटे पहले बीज को पानी में भिगोकर रखना चाहिए और इसके बाद छाया में सुखाकर बुआई करनी चाहिए। इसकी बुआई के लिए देशी हल जिसमें पोरा लगा हो या सीड ड्रिल से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर बुआई करनी चाहिए। बीज की गहराई 5-7 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, जो मिट्टी की नमी पर निर्भर करती है।

मटर की खेती का समय और जलवायु 

इसकी खेती के लिए मटियार दोमट और दोमट भूमि सबसे उपयुक्त होती है, जिसका पीएच मान 6-7.5 होना चाहिए। इसकी खेती के लिए अम्लीय भूमि सब्जी वाली मटर की खेती के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं मानी जाती है। इसकी खेती के लिए अक्टूबर-नवंबर माह का समय उपयुक्त होता है। इस खेती में बीज अंकुरण के लिए औसत 22 डिग्री सेल्सियस की जरूरत होती है, वहीं अच्छे विकास के लिए 10 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर होता है।

मटर की फसल मे खाद 

मटर में सामान्यत: 20 किलोग्राम, नाइट्रोजन और 60 किलोग्राम फास्फोरस बुआई के समय देना पर्याप्त है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर 100-125 किलोग्राम डाईअमोनियम फास्फेट (डी, ए, पी) दिया जा सकता है। पोटेशियम की कमी वाले क्षेत्रों में 20 किलोग्राम पोटाश (म्यूरेट ऑफ पोटाश के माध्यम से) दिया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में गंधक की कमी हो, वहां बुआई के समय गंधक भी देना चाहिए। यदि हो सके तो मिट्टी की जांच अवश्य करें ताकि पोषक तत्वों की पूर्ति करने में आसानी हो।

मटर की खेती मे सिंचाई 

 मटर के पौधे में कितने दिन में पानी दें। मटर की उन्नत खेती में प्रारंभ में मिट्टी में नमी और शीत ऋतु की वर्षा के आधार पर 1-2 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के समय और दूसरी सिंचाई फलियां बनने के समय करनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हल्की सिंचाई करें और फसल में पानी ठहरा न रहे।

मटर की खेती मे खपतवार नियंत्रण 

यदि खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार, जैसे-बथुआ, सेंजी, कृष्णनील, सतपती अधिक हों तो 4-5 लीटर स्टाम्प-30 (पैंडीमिथेलिन) को 600-800 लीटर पानी में मिश्रित करके प्रति हेक्टेयर की दर से घोलकर बुआई के तुरंत बाद छिड़ाकाव कर देना चाहिए। इससे काफी हद तक खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।

मटर की खेती मे तुड़ाई 

मटर की फसल सामान्यत: 130-150 दिनों में पकती है। इसकी कटाई दरांती से करनी चाहिए, और 5-7 दिनों धूप में सुखाने के बाद बैलों से मड़ाई करनी चाहिए। साफ दानों को 3-4 दिनों धूप में सुखाकर उन्हें भंडारण पात्रों (बिन) में करना चाहिए। भंडारण के दौरान कीटों से सुरक्षा के लिए एल्युमिनियम फोस्फाइड का उपयोग करना चाहिए।

सारांश:-

किसान भाई हमने आपको बताया है की आप मटर की खेती खेती कैसे कर सकते है और उसके लिय आपको सभी जानकारी इस लेक के अंदर दी हुई है तो आप इस लेख को ध्यान से पढे 

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